डेटा निजता का सवाल हमारे यहाँ अक्सर तब उठता है जब किसी का बैंक खाता खाली हो जाता है या किसी की तस्वीर बिना इजाज़त वायरल हो जाती है। उस दिन हम पूछते हैं कि हमारा नंबर, हमारा पता, हमारी पसंद-नापसंद किसके पास पहुँची। फिर अगले दिन फ़ोन उठाते हैं, किसी नए ऐप की लंबी शर्तों पर बिना पढ़े “I Agree” दबाते हैं, और भूल जाते हैं।
पर इस हफ़्ते दुनिया के दूसरे छोर से एक ख़बर आई है, जो हमें भूलने नहीं देनी चाहिए।
एक जुर्माना, जो सिर्फ़ अमेरिका की ख़बर नहीं
21 अक्टूबर को अमेरिका के न्यू मेक्सिको राज्य की एक अदालत ने फ़ेसबुक और इंस्टाग्राम की मालिक कंपनी मेटा को 25 अरब डॉलर चुकाने का आदेश दिया। भारतीय मुद्रा में यह रक़म दो लाख करोड़ रुपये से भी ज़्यादा बैठती है। इससे पहले सितंबर में वहाँ की जूरी ने पाया था कि कंपनी ने यूज़र्स के डेटा तक पहुँच के बारे में लोगों को गुमराह किया, और राज्य के उपभोक्ता क़ानून का करोड़ों बार उल्लंघन हुआ।
मामले की जड़ 2018 का कैम्ब्रिज एनालिटिका प्रकरण है, जिसमें एक तीसरे पक्ष के ऐप के ज़रिए करोड़ों लोगों का निजी डेटा एक राजनीतिक परामर्श कंपनी तक पहुँचा था। PBS की रिपोर्ट के अनुसार यह मेटा पर अब तक का सबसे बड़ा जुर्माना है। जज ने यह भी माना कि क़ानून के हिसाब से रक़म 219 अरब डॉलर तक जा सकती थी। मेटा ने अपील करने की बात कही है और इसे “बोलने की आज़ादी पर टैक्स” बताया है।
किसी अमेरिकी राज्य की अदालत का फ़ैसला हमारे लिए संपादकीय का विषय क्यों हो? क्योंकि जिस कंपनी को यह सज़ा मिली, उसके सबसे ज़्यादा उपयोगकर्ता अमेरिका में नहीं, भारत में हैं। व्हाट्सऐप पर ही पचास करोड़ से ज़्यादा भारतीय हैं। और कैम्ब्रिज एनालिटिका कांड में भारत भी पीड़ितों की सूची में था।
भारत में डेटा निजता: वही कांड, अलग अंजाम
फ़ेसबुक ने ख़ुद भारतीय जाँच एजेंसियों को बताया था कि उस विवादित ऐप को भारत में भले कुछ सौ लोगों ने इंस्टॉल किया था, पर उनके दोस्तों के ज़रिए क़रीब 5.62 लाख भारतीयों का डेटा खींचा जा सकता था। सीबीआई ने जनवरी 2021 में कैम्ब्रिज एनालिटिका और ग्लोबल साइंस रिसर्च के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया। उसके बाद से इस मामले में कोई ठोस नतीजा सार्वजनिक बहस में नहीं दिखा।
एक ही घटना, दो देश। एक जगह अदालत ने कंपनी की तिजोरी पर हाथ डाला, दूसरी जगह फ़ाइल धीरे-धीरे धूल ओढ़ती रही। यह फ़र्क़ सिर्फ़ क़ानूनों का नहीं, इस बात का है कि कोई समाज अपनी डेटा निजता को कितना क़ीमती मानता है।
ऐसा नहीं कि भारत में कुछ हुआ ही नहीं। नवंबर 2024 में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने व्हाट्सऐप की 2021 वाली “मानो या छोड़ो” निजता नीति पर मेटा पर 213.14 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था। साथ ही पाँच साल तक विज्ञापन के लिए डेटा साझा करने पर रोक लगाई थी। नवंबर 2025 में NCLAT ने जुर्माना तो बरक़रार रखा, पर डेटा साझा करने की वह रोक हटा दी। अब मामला सुप्रीम कोर्ट में है।
ज़रा दोनों रक़मों को साथ रखकर देखिए। भारत का जुर्माना न्यू मेक्सिको वाले जुर्माने का लगभग हज़ारवाँ हिस्सा है। और न्यू मेक्सिको की आबादी हमारे किसी मझोले ज़िले जितनी है।
क़ानून आया, पर दाँत कब निकलेंगे?
सरकार कह सकती है कि अब तस्वीर बदल रही है, और यह बात आंशिक रूप से सही है। संसद ने 2023 में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) क़ानून पारित किया। नवंबर 2025 में इसके नियम अधिसूचित हुए, जिनमें एक उल्लंघन पर 250 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है, और एक डेटा संरक्षण बोर्ड भी बना है।
पर इस क़ानून की ज़्यादातर ज़िम्मेदारियाँ चरणबद्ध ढंग से मई 2027 से लागू होंगी। यानी डेटा निजता का जो वादा 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने पुट्टस्वामी फ़ैसले में निजता को मौलिक अधिकार बताकर किया था, वह ज़मीन पर उतरने में पूरा एक दशक ले रहा है। इस बीच हर दिन करोड़ों लोग अपना डेटा उन्हीं शर्तों पर सौंप रहे हैं, जिन्हें वे न पढ़ते हैं, न समझते हैं।
एक और पेच है। यह बोर्ड सरकार द्वारा नियुक्त होता है, और क़ानून सरकार को अपनी एजेंसियों को कई प्रावधानों से छूट देने का अधिकार भी देता है। जब नागरिक का डेटा निजी कंपनियों के साथ-साथ सरकारी तंत्र के पास भी सबसे ज़्यादा हो, तब डेटा निजता की निगरानी करने वाले की स्वतंत्रता ही असली कसौटी बन जाती है।
दूसरा पक्ष: क्या भारी जुर्माना ही इलाज है?
ईमानदारी से विपरीत तर्क भी सुनना चाहिए। एक बड़ा वर्ग मानता है कि भारत को अमेरिकी मॉडल की नक़ल नहीं करनी चाहिए। वहाँ की अदालतों के भारी जुर्माने अक्सर अपील में घट जाते हैं, और सालों की मुक़दमेबाज़ी में असली पीड़ित को कुछ नहीं मिलता। मेटा की अपील के बाद 25 अरब डॉलर का क्या होगा, यह अभी कोई नहीं जानता।
यह भी सच है कि भारत की डिजिटल क्रांति इन्हीं मुफ़्त प्लेटफ़ॉर्म्स के सहारे गाँव-क़स्बों तक पहुँची। छोटे दुकानदार व्हाट्सऐप से ग्राहक जोड़ते हैं, किसान यूट्यूब से खेती सीखते हैं। बहुत कड़े नियम छोटे भारतीय स्टार्टअप्स का गला घोंट सकते हैं, जबकि बड़ी कंपनियाँ वकीलों की फ़ौज से हर नियम झेल लेंगी।
ये चिंताएँ जायज़ हैं। पर इनसे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि डेटा निजता पर जवाबदेही ढीली रहे। सवाल जुर्माने की रक़म से ज़्यादा इस बात का है कि उल्लंघन करने वाले को सचमुच डर लगे या नहीं। 213 करोड़ रुपये किसी वैश्विक कंपनी के लिए एक तिमाही के विज्ञापन ख़र्च से भी कम हो सकते हैं। ऐसा जुर्माना सज़ा नहीं, कारोबार की एक मामूली लागत बन जाता है।
डेटा निजता को वोट का मुद्दा कब बनाएँगे?
मेरी समझ में असली कमी क़ानून की किताब में नहीं, हमारी सामूहिक चेतना में है। हम पेट्रोल के दाम पर सड़क पर उतरते हैं, पर अपने डेटा की चोरी को “चलता है” कहकर टाल देते हैं। जिस दिन ठगी होती है, उस दिन का ग़ुस्सा भी व्यक्तिगत रहता है। मैंने पिछले दिनों साइबर ठगी के बोझ पर लिखा था कि नुक़सान हमेशा आख़िर में ग्राहक के कंधे पर ही क्यों आता है। डेटा निजता का मामला उसी कहानी की पहली कड़ी है।
न्यू मेक्सिको का फ़ैसला किसी केंद्रीय नियामक ने नहीं, एक राज्य के अटॉर्नी जनरल की ज़िद ने दिलवाया, जिसने 2021 में मुक़दमा दायर किया और पाँच साल लड़ा। भारत में भी राज्यों के उपभोक्ता आयोग, नागरिक संगठन और अदालतें यह भूमिका निभा सकते हैं, बशर्ते उन्हें यह भरोसा हो कि समाज उनके साथ खड़ा है।
आने वाले बरसों में यह सवाल और भारी होगा। अब हमारा डेटा सिर्फ़ विज्ञापन दिखाने के काम नहीं आता, बल्कि उन AI मॉडलों को सिखाने में भी इस्तेमाल होता है जो कल हमारी नौकरी, क़र्ज़ और इलाज के फ़ैसले करेंगे। AI की नैतिकता पर जो बहस आज विद्वानों के बीच है, वह कल हर घर की बहस होगी।
इसलिए ज़रूरी है कि DPDP क़ानून के बाक़ी चरण तय समय से पहले लागू हों, डेटा संरक्षण बोर्ड को सचमुच स्वतंत्र बनाया जाए, और जुर्माना कंपनी के भारतीय कारोबार के अनुपात में तय हो, न कि किसी स्थिर सीमा में बँधा रहे। कैम्ब्रिज एनालिटिका जैसे पुराने मामलों की जाँच की स्थिति भी सार्वजनिक की जानी चाहिए।
हम अक्सर कहते हैं कि अगर कोई सेवा मुफ़्त है, तो असली उत्पाद आप ख़ुद हैं। न्यू मेक्सिको ने बताया कि उस “उत्पाद” की भी एक क़ीमत होती है, और उसे वसूला जा सकता है। हमारी डेटा निजता की क़ीमत कितनी है, यह कोई अमेरिकी अदालत तय नहीं करेगी। यह तय होगा इस बात से कि अगली बार “I Agree” दबाने से पहले हम कितनी देर रुकते हैं, और अपनी सरकार से कितनी ऊँची आवाज़ में पूछते हैं।
रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
9425611243



