हर एक डॉलर का सामान हम चीन को बेचते हैं, तो बदले में छह डॉलर से ज़्यादा का सामान वहाँ से ख़रीद लाते हैं। चीन से व्यापार घाटा इस साल के पहले नौ महीनों में ही 105.93 अरब डॉलर तक पहुँच गया है, और यह आँकड़ा किसी विपक्षी नेता के भाषण से नहीं, बल्कि चीन के अपने कस्टम विभाग के रिकॉर्ड से निकला है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसी दौरान भारत का चीन को निर्यात 40.7 प्रतिशत बढ़ा है। यानी हमने बेहतर खेला, फिर भी स्कोरबोर्ड पर फ़ासला और बढ़ गया। यह विरोधाभास ही आज की असली ख़बर है।
चीन से व्यापार घाटा: आँकड़े क्या कहते हैं
14 अक्टूबर को जारी चीनी कस्टम आँकड़ों के मुताबिक़ जनवरी से सितंबर 2026 के बीच भारत ने चीन से 125.19 अरब डॉलर का आयात किया, जो पिछले साल से 23.3 प्रतिशत ज़्यादा है। इसके मुक़ाबले चीन को हमारा निर्यात सिर्फ़ 19.26 अरब डॉलर रहा। BW Businessworld की रिपोर्ट के अनुसार दोनों देशों का कुल व्यापार 144.45 अरब डॉलर पहुँच गया है।
पिछले साल यानी 2025 में यह घाटा 116.12 अरब डॉलर के रिकॉर्ड पर था, और 2024 में 99.21 अरब डॉलर, जैसा कि PTI के हवाले से छपी रिपोर्ट बताती है। इस रफ़्तार से चीन से व्यापार घाटा 2026 में एक नया रिकॉर्ड बनाने की ओर है। साल के बचे तीन महीनों में दस अरब डॉलर का फ़ासला पार करना मुश्किल नहीं लगता।
ध्यान रहे, चीन कैलेंडर वर्ष में हिसाब रखता है और भारत अप्रैल से मार्च वाले वित्त वर्ष में, इसलिए दोनों देशों के आँकड़े पूरी तरह मेल नहीं खाते। पर दिशा दोनों में एक ही है। भारत के अपने आँकड़ों में भी 2025-26 का घाटा 112 अरब डॉलर से ऊपर दर्ज हुआ।
असली सवाल: निर्यात बढ़ा तो घाटा क्यों नहीं घटा
इसका जवाब इस बात में छिपा है कि हम क्या बेचते हैं और क्या ख़रीदते हैं। भारत चीन को समुद्री उत्पाद, नैफ्था और कुछ printed circuit boards बेचता है। चीन से हम इलेक्ट्रॉनिक्स, बिजली की मशीनें, रसायन, components, solar उपकरण, telecom gear और खाद बनाने के कच्चे माल ख़रीदते हैं।
यानी हम कच्चा या कम मूल्य वाला सामान बेचते हैं और वह सामान ख़रीदते हैं जिससे हमारे कारख़ाने चलते हैं। चीन से व्यापार घाटा इसलिए सिर्फ़ खाते-बही का मामला नहीं है। यह इस बात का आईना है कि भारतीय उद्योग की रीढ़ में कितने चीनी पुर्ज़े लगे हैं।
एक विडंबना और है। जब भारत में मोबाइल फ़ोन की असेंबली बढ़ती है, solar panel लगते हैं या दवा का उत्पादन बढ़ता है, तो चीन से आयात भी साथ-साथ बढ़ता है। जितना हम “मेक इन इंडिया” करते हैं, उतना ही ज़्यादा “मेड इन चाइना” पुर्ज़ा मँगाते हैं। चिप के सपने और ज़मीन की सच्चाई पर पिछले दिनों यही बात दूसरे सिरे से उठी थी।
यह कोई नई बीमारी भी नहीं है। 2013-14 में भारत के अपने आँकड़ों में चीन से व्यापार घाटा करीब 36 अरब डॉलर था और तब भी इसे “चिंताजनक” कहा गया था। बारह साल में शब्द वही रहे, घाटा लगभग तीन गुना हो गया।
निर्भरता का ख़तरा पैसे से बड़ा है
अगर बात सिर्फ़ डॉलर की होती, तो शायद इतनी चिंता की ज़रूरत नहीं थी। दुनिया के कई देश किसी एक साझेदार से घाटे में व्यापार करते हैं और फिर भी फलते-फूलते हैं। असली ख़तरा तब पैदा होता है जब आपकी ज़रूरत की चीज़ का दरवाज़ा किसी और के हाथ में हो।
पिछले कुछ समय में चीन ने खाद और रेयर अर्थ्स जैसी चीज़ों के निर्यात पर नियंत्रण लगाए हैं। खाद का मतलब है किसान की बोआई, और रेयर अर्थ्स का मतलब है बिजली की गाड़ियाँ, मोटरें और रक्षा उपकरण। जिस दिन यह दरवाज़ा थोड़ा भी सिकुड़ता है, उसका असर नासिक के अंगूर किसान से लेकर पुणे की ऑटो फ़ैक्ट्री तक पहुँचता है।
यही वजह है कि चीन से व्यापार घाटा अब आर्थिक सवाल से ज़्यादा रणनीतिक सवाल बन गया है। सीमा पर तनाव हो और कारख़ाने उसी पड़ोसी के पुर्ज़ों पर टिके हों, तो मोलभाव की ताक़त किसके पास रहती है, यह समझना कठिन नहीं। घाटे की भरपाई के लिए डॉलर भी बाहर जाते हैं, और गिरते रुपये का बिल अंततः आम आदमी की जेब से ही चुकता होता है।
भारत के विदेश मंत्रालय ने भी हालिया बातचीत में “structural trade imbalance” यानी ढाँचागत असंतुलन की बात दोहराई है। पर यह शब्द हम पिछले एक दशक से हर बैठक के बाद सुनते आ रहे हैं।
दूसरा पक्ष: सस्ता चीनी सामान भी तो हमारी ज़रूरत है
ईमानदारी से देखें तो तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। सस्ते चीनी सोलर पैनल न होते, तो भारत की सौर ऊर्जा क्षमता इतनी तेज़ी से नहीं बढ़ती। सस्ते कम्पोनेंट्स न होते, तो करोड़ों भारतीयों के हाथ में सस्ता स्मार्टफ़ोन नहीं पहुँचता। छोटे उद्योग भी चीनी मशीनों के सहारे ही अपनी लागत काबू में रखते हैं।
अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग यह भी कहता है कि किसी एक देश के साथ घाटा अपने-आप में बुरा नहीं है। देखना यह चाहिए कि कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था कितनी प्रतिस्पर्धी है। अगर चीनी पुर्ज़े लेकर भारत तैयार माल बनाकर अमेरिका या यूरोप को बेचता है, तो यह सौदा फ़ायदे का भी हो सकता है।
यह तर्क वज़नदार है, पर चीन से व्यापार घाटा जिस रफ़्तार से बढ़ रहा है, उसके सामने अधूरा है। The Wire की रिपोर्ट दिखाती है कि आयात हर महीने नई ऊँचाई छू रहा है, जबकि आयात पर टिका निर्यात उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ रहा। सस्ता आयात तब तक वरदान है जब तक वह हमें सीखने और बनाने का समय दे। जब वह सीखने की ज़रूरत ही ख़त्म कर दे, तब वह आदत बन जाता है।
चीन से व्यापार घाटा घटाने का रास्ता नारे से नहीं निकलेगा
मेरी राय में समस्या नीयत की नहीं, धैर्य की है। हमने production-linked incentive जैसी योजनाएँ बनाईं, ऐप्स पर प्रतिबंध लगाए, कभी-कभार बहिष्कार के नारे भी दिए। पर सामान जोड़ने की फ़ैक्ट्री और सामान बनाने की क्षमता में बड़ा फ़र्क है। असेंबली दो साल में आ जाती है, केमिकल्स, मशीन-टूल्स और कम्पोनेंट्स का पूरा तंत्र खड़ा करने में दस-पंद्रह साल लगते हैं।
इसलिए पहला क़दम है ईमानदार गिनती। हर क्षेत्र के लिए यह साफ़ होना चाहिए कि किस पुर्ज़े पर हमारी निर्भरता कितनी है और उसे घटाने की समय-सीमा क्या है। दूसरा, शोध और कौशल पर लंबा निवेश, क्योंकि चीन की असली बढ़त उसकी सस्ती मज़दूरी नहीं, उसका विशाल ईंजीनियरिंग आधार है।
तीसरा, चीन के बाज़ार में अपने दवा, कृषि और सेवा क्षेत्र के लिए बराबर का दरवाज़ा माँगना, और उसके लिए लगातार दबाव बनाए रखना। शी चिनफिंग की दिल्ली यात्रा के समय रिश्तों में जो गर्माहट दिखी थी, उसकी असली परीक्षा यही है कि वह बाज़ार तक पहुँचती है या नहीं।
चीन से व्यापार घाटा एक दिन में नहीं बना और एक बजट में ख़त्म भी नहीं होगा। पर अगर अगले दस साल बाद भी हम यही आँकड़ा पढ़ते हुए “चिंताजनक” शब्द दोहरा रहे हों, तो मान लेना चाहिए कि हमने चिंता करना तो सीखा, बदलना नहीं।
आत्मनिर्भरता किसी नारे या ऐप पर लगी पाबंदी से नहीं आती। वह उस दिन आती है जब किसी भारतीय कारख़ाने का मालिक यह सोचे बिना अपना अगला ऑर्डर ले सके कि ग्वांगझू से पुर्ज़ा समय पर आएगा या नहीं। तब तक हर नया रिकॉर्ड हमें याद दिलाता रहेगा कि छह डॉलर के बदले एक डॉलर का सौदा व्यापार कम, निर्भरता ज़्यादा है।
रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
9425611243

