← सभी रचनाएँ

जब महंगाई खेत से आए, तो इलाज बैंक में क्यों?

रेपो रेट बढ़ोतरी — जब महंगाई खेत से आए, तो इलाज बैंक में क्यों?

मान लीजिए, किसी मरीज़ को लू लग गई है और डॉक्टर उसे खांसी की दवाई दे रहा है। दवाई अच्छी है, असरदार भी है, पर सवाल यह है कि बीमारी वही है या नहीं। आज जब रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) तीन दिन की बैठक के लिए बैठी है, और बाज़ार लगभग मान चुका है कि बुधवार को रेपो रेट बढ़ेगा, तब यही उलझन सबसे ज़्यादा सोचने लायक है। महंगाई लौट आई है, यह सच है। लेकिन यह महंगाई आई कहाँ से है, और क्या ब्याज दर का औज़ार वहाँ तक पहुँच भी सकता है?

ख़बर इतनी है कि अगस्त में खुदरा महंगाई 4.82 प्रतिशत पर पहुँच गई, जो जुलाई में 4.45 प्रतिशत थी और जो करीब बीस महीनों का सबसे ऊँचा स्तर है। लगातार तीन महीने से यह रिज़र्व बैंक के चार प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर है। खाद्य महंगाई लगभग छह प्रतिशत (5.95%) छू रही है। Nomura जैसी ब्रोकरेज फ़र्में अक्टूबर और दिसंबर में चौथाई-चौथाई प्रतिशत की दो बढ़ोतरी का अनुमान लगा रही हैं, और बाज़ार तो इससे भी ज़्यादा सख़्ती की उम्मीद कर रहा है। यानी रेपो रेट बढ़ोतरी अब लगभग तय मानी जा रही है। रेपो रेट दिसंबर 2025 से 5.25 प्रतिशत पर टिका है। यानी सस्ते कर्ज़ का जो दौर पिछले डेढ़ साल में 6.5 से 5.25 प्रतिशत तक की कटौतियों से बना था, वह अब पलटने की कगार पर है।

असली सवाल यह नहीं कि दर बढ़ेगी या नहीं। असली सवाल यह है कि जब महंगाई खेत से और समंदर पार के तेल से आ रही हो, तब उसका इलाज बैंक की खिड़की पर क्यों खोजा जा रहा है, और उस इलाज की कीमत कौन चुकाएगा?

आंकड़ों को ध्यान से देखिए तो तस्वीर ख़ुद बोलती है। ग्रामीण महंगाई 5.23 प्रतिशत है, शहरी 4.31 प्रतिशत। गाँव और शहर के बीच यह लगभग एक प्रतिशत का फ़ासला बढ़ता जा रहा है। ग्रामीण खाद्य महंगाई 6.13 प्रतिशत है। अदरक करीब 74 प्रतिशत, प्याज़ 48 प्रतिशत और लहसुन 44 प्रतिशत महंगा हुआ है, जबकि टमाटर और आलू सस्ते हुए हैं। यह किसी “गर्म अर्थव्यवस्था” की तस्वीर नहीं है जिसमें लोग जेब भरकर बेतहाशा ख़रीदारी कर रहे हों। यह कमज़ोर मानसून की तस्वीर है। 19 सितंबर तक देश भर में बारिश सामान्य से करीब 15 प्रतिशत कम रही, और केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार बड़े जलाशयों में पानी पिछले साल से लगभग 20 प्रतिशत कम है। कुछ आकलन इसे 2009 के बाद का सबसे कठिन सूखा बता रहे हैं। ऊपर से पश्चिम एशिया के तनाव ने ब्रेंट कच्चे तेल को सौ डॉलर प्रति बैरल के पार पहुँचा दिया है, और कमज़ोर रुपया आयात को और महंगा बना रहा है।

अब ज़रा सोचिए कि रेपो रेट बढ़ने से इनमें से क्या बदलेगा। बादल नहीं बरसेंगे। प्याज़ की फ़सल जल्दी नहीं पकेगी। पश्चिम एशिया से आने वाला तेल सस्ता नहीं होगा। ब्याज दर माँग पर चोट करती है, यानी लोगों और कंपनियों के उधार लेने और ख़र्च करने पर। आपूर्ति के झटके पर उसका असर बहुत अप्रत्यक्ष और धीमा होता है। अर्थशास्त्र की किताबें भी यही कहती हैं कि सप्लाई शॉक को “देखते रहना” चाहिए, उस पर टूट नहीं पड़ना चाहिए।

फिर भी मामला इतना सीधा नहीं है, और यहीं ईमानदारी से दूसरे पक्ष को सुनना ज़रूरी है। रिज़र्व बैंक के पास दर बढ़ाने के अपने ठोस कारण हैं। पहला, कोर महंगाई, यानी खाने और ईंधन को छोड़कर बाक़ी चीज़ों की महंगाई, मार्च के 3.3 प्रतिशत से बढ़कर अगस्त में 4.3 प्रतिशत हो गई है। इसका मतलब है कि दाम बढ़ने का दबाव अब सिर्फ़ थाली तक सीमित नहीं रहा, कपड़े, सेवाएँ, किराया और परिवहन भी उसकी चपेट में आने लगे हैं। दूसरा, बैंक कर्ज़ लगभग 20 प्रतिशत की रफ़्तार से बढ़ रहा है, जो बताता है कि सस्ते पैसे ने कहीं न कहीं माँग को हवा दी है। तीसरा और शायद सबसे अहम, महंगाई की उम्मीदें। अगर लोग, दुकानदार और कंपनियाँ यह मान लें कि दाम अब बढ़ते ही रहेंगे, तो वे पहले से ही क़ीमतें और वेतन की माँगें बढ़ाने लगते हैं, और एक अस्थायी झटका स्थायी बीमारी बन जाता है। चौथा, गिरता रुपया। अगर भारत में ब्याज दरें बाक़ी दुनिया की तुलना में बहुत आकर्षक न रहें तो विदेशी पूंजी बाहर जाती है, रुपया और गिरता है, और आयातित महंगाई और बढ़ती है। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रिज़र्व बैंक ने भी यही तर्क देकर कुछ ही महीनों में रेपो रेट 4 से 6.5 प्रतिशत तक पहुँचा दिया था।

ये तर्क कमज़ोर नहीं हैं। एक नपी-तुली, छोटी बढ़ोतरी शायद ज़रूरी भी हो, ताकि बाज़ार को यह संदेश जाए कि केंद्रीय बैंक सोया हुआ नहीं है। लेकिन दिक़्क़त तब शुरू होती है जब यह छोटा क़दम पूरी नीति का विकल्प बन जाता है। जब मान लिया जाता है कि महंगाई से लड़ने का ठेका अकेले रिज़र्व बैंक का है, और सरकार की भूमिका बस बयान देने तक है।

यहाँ यह भी देखना होगा कि अर्थव्यवस्था की नब्ज़ क्या कह रही है। अगस्त में मैन्युफ़ैक्चरिंग PMI 52.8 पर आ गया, जो 2021 के बाद का सबसे निचला स्तर है। हवाई यात्रा, FASTag भुगतान और माल ढुलाई जैसे संकेतक धीमे पड़े हैं। यानी विकास पहले से हांफ रहा है। ऐसे में ब्याज दर की बढ़ोतरी का बोझ सबसे पहले उन पर पड़ेगा जो पहले से दबाव में हैं: छोटे और मझोले उद्योग, जिनकी कार्यशील पूंजी उधार पर चलती है; होम लोन की EMI भरता मध्यवर्ग; और वह युवा जो पहली बार दुकान या स्टार्टअप के लिए कर्ज़ लेने की सोच रहा है। और विडंबना देखिए, जिस ग्रामीण परिवार की थाली सबसे ज़्यादा महंगी हुई है, उसे इस बढ़ोतरी से कोई राहत नहीं मिलेगी, क्योंकि उसकी महंगाई की वजह बैंक की दर नहीं, सूखा खेत है। उल्टे अगर कर्ज़ महंगा होने से ग्रामीण निर्माण और ग़ैर-कृषि रोज़गार धीमे पड़े, तो उसकी आमदनी पर दोहरी मार पड़ सकती है।

मेरा तर्क यह है कि महंगाई की यह लहर मौद्रिक कम और प्रबंधन की समस्या ज़्यादा है। प्याज़, दाल और खाद्य तेल के बफ़र स्टॉक को समय पर बाज़ार में उतारना, ज़रूरत हो तो आयात शुल्क में अस्थायी ढील, निर्यात नीति में अचानक पलटी मारने की जगह पहले से तय नियम, कोल्ड स्टोरेज और भंडारण की वह कमी दूर करना जिसकी वजह से हर साल सब्ज़ियाँ सड़ती हैं, और सूखा प्रभावित ज़िलों में मनरेगा का काम और भुगतान तेज़ करना, ये वे क़दम हैं जो सीधे बीमारी पर असर करते हैं। तेल के मोर्चे पर भी यह सोचने का वक़्त है कि जब दाम गिरे थे तब बढ़ाए गए उत्पाद शुल्क का कुछ हिस्सा अब उपभोक्ता को लौटाया जाए या नहीं। राजकोषीय गुंजाइश सीमित है, यह मानना पड़ेगा, लेकिन हर चीज़ का बोझ ब्याज दर पर डाल देना भी एक तरह से ज़िम्मेदारी से बचना है।

रिज़र्व बैंक से भी एक अपेक्षा है: साफ़ बोलने की। अगर वह दर बढ़ाता है तो उसे यह स्पष्ट करना चाहिए कि यह क़दम कोर महंगाई और रुपये की स्थिरता के लिए है, सूखे से पैदा हुई खाद्य महंगाई को “ठीक” करने के लिए नहीं। ऐसा न हो कि अगर अगले तीन महीनों में मानसून की कमी और तेल की वजह से महंगाई छह प्रतिशत के पार जाए, तो एक के बाद एक बढ़ोतरी का सिलसिला शुरू हो जाए, और जब तक नई फ़सल आकर दाम उतारे, तब तक कर्ज़ की सख़्ती विकास की कमर तोड़ चुकी हो। इतिहास बताता है कि केंद्रीय बैंक अक्सर देर से जागते हैं और फिर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर लगा देते हैं।

इस बहस का बड़ा अर्थ यह है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में भारत की महंगाई का चरित्र बदल रहा है। अल नीनो, लू, बेमौसम बारिश, ये अब अपवाद नहीं, बार-बार आने वाले झटके हैं। अगर हर ख़राब मानसून के बाद हमारी पहली प्रतिक्रिया ब्याज दर बढ़ाना होगी, तो हम एक ऐसी अर्थव्यवस्था बना रहे होंगे जो हर सूखे की सज़ा दो बार भुगतेगी, एक बार खेत में और दूसरी बार कारख़ाने में। असली तैयारी पानी, भंडारण, फ़सल विविधता और आपूर्ति शृंखला में है, और वह तैयारी किसी तीन दिन की बैठक में नहीं होती।

बुधवार को जब गवर्नर दर का ऐलान करेंगे, तो टीवी पर बहस होगी कि चौथाई प्रतिशत सही था या आधा। पर असली सवाल उस किसान का है जो सूखे खेत की मेड़ पर खड़ा है, और उस छोटे कारोबारी का जो अगले महीने की EMI का हिसाब लगा रहा है। दोनों एक ही महंगाई से जूझ रहे हैं, पर दोनों का इलाज एक नहीं हो सकता। अगर नीति यह फ़र्क़ नहीं समझेगी, तो वह मरीज़ को ठीक नहीं करेगी, बस इतना ही साबित करेगी कि उसके पास दवाई थी।

रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
9425611243

इस रचना को शेयर करें

एक टिप्पणी

अपनी बात लिखें

Your email address will not be published. Required fields are marked *