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अहल्या : पाषाण में धड़कता स्त्रीत्व

शांति नायर के कविता-संग्रह ‘अहल्या’ पर साहित्यिक समीक्षा

शांति नायर की ‘अहल्या’ को पढ़ते हुए सबसे पहले जो बात मन में उतरती है, वह यह नहीं कि अहल्या पत्थर क्यों बनी, बल्कि यह कि आखिर उसे पत्थर बनाने का अधिकार किसे था। मिथक ने हमें एक ऐसी कथा दी है जिसे हम सदियों से लगभग बिना किसी प्रतिप्रश्न के स्वीकार करते आए हैं-अहल्या गौतम ऋषि की पत्नी थीं, इंद्र ने छल किया, गौतम ने शाप दिया और राम के चरण-स्पर्श से उनका उद्धार हुआ। कथा में सब कुछ अपनी जगह पर है, लेकिन जैसे ही हम इस कथा को अहल्या की आँखों से देखने की कोशिश करते हैं, उसकी सारी व्यवस्थितता टूटने लगती है। अचानक दिखाई देता है कि उसके जीवन के तीन निर्णायक क्षणों में तीन पुरुष उपस्थित हैं-इंद्र, जिसने उसके साथ छल किया; गौतम, जिसने उसके बारे में निर्णय दिया; और राम, जिन्होंने उसका उद्धार किया। इन तीनों के बीच अहल्या कहाँ है? उसका अपना कथन कहाँ है? उसकी इच्छा कहाँ है? उसका प्रतिवाद कहाँ है? उसका ‘मैं’ कहाँ है?

शांति नायर की ‘अहल्या’ की सबसे बड़ी सार्थकता यही है कि वह इस अनुपस्थित ‘मैं’ की तलाश करती है। यह केवल एक मिथकीय पात्र पर लिखी गई कविताओं की पुस्तक नहीं रह जाती, बल्कि मिथक के भीतर छिपे उस मौन की खोज बन जाती है, जिसे इतिहास, धर्म, महाकाव्य और पुरुष-केन्द्रित स्मृति ने मिलकर इतना गहरा कर दिया कि वह हमें दिखाई ही नहीं देता। पुस्तक की पहली कविता में ही कवयित्री “उद्धरण चिन्हों के भीतर” चलती हुई उपमाओं और “पत्थर बनी अहल्या” की ओर देखती हैं और चाहती हैं कि “सारी व्यवस्थाएँ”, “सारी व्याख्याएँ” और “सारी मिथ्याएँ” उधड़ जाएँ, ताकि अहल्या महाकाव्यों की सीमा से बाहर आ सके। यह आरम्भ ही बता देता है कि शांति नायर की रुचि कथा को फिर से कहने में नहीं, कथा के भीतर छूट गई स्त्री को खोजने में है।

और शायद यही वह जगह है जहाँ इस पुस्तक को केवल स्त्री-विमर्श की दृष्टि से पढ़ना उसके साथ न्याय नहीं होगा। यह उससे अधिक गहरी चीज है। यह स्मृति की आलोचना है। यह उस सभ्यता से सवाल है जो अपने मिथकों में स्त्रियों को अमर तो करती है, लेकिन उनकी आवाज़ को अमर नहीं करती। हम अहल्या को जानते हैं, पर अहल्या की आवाज़ को नहीं जानते। हम जानते हैं कि उसके साथ क्या हुआ, लेकिन यह नहीं जानते कि उस घटना के बाद उसके भीतर क्या हुआ। शांति नायर की कविताएँ इसी दूसरे प्रश्न की ओर जाती हैं।

यहीं ‘पाषाण’ का रूपक असाधारण अर्थ ग्रहण करता है। यदि हम अहल्या के पत्थर बनने को केवल अलौकिक घटना मानें तो यह कथा का चमत्कार है; यदि इसे गौतम के शाप का परिणाम मानें तो यह दंड की कथा है; लेकिन यदि पाषाण को मनुष्य की मानसिक अवस्था का रूपक मानें, तो अहल्या का मिथक अचानक हमारे समय में प्रवेश कर जाता है। छल, अविश्वास, सामाजिक निर्णय, अपराधबोध और एक स्त्री की अपनी ही बात पर विश्वास खो देने की स्थिति-ये सब मिलकर किसी जीवित मनुष्य को भीतर से पाषाणवत कर सकते हैं। पत्थर शायद बाहर नहीं हुआ था; पत्थर उसके भीतर हुआ होगा।

शांति नायर की कविता 19 को इसी अर्थ में पढ़ना बहुत जरूरी है। वहाँ एक ऐसी स्त्री बोलती दिखाई देती है जिसके भीतर आग है, लेकिन उसकी अनुभूति की अभिव्यक्ति सहज नहीं है। “आग जलती नहीं”, “केवल धुआँ उठता है”-इस तरह की छवियाँ उस मनःस्थिति तक ले जाती हैं जहाँ भीतर का ताप मौजूद है, लेकिन उसका विस्फोट नहीं होता। यह वही अवस्था है जिसे आज की मनोवैज्ञानिक भाषा में गहरे मानसिक आघात के बाद की संवेदनात्मक जड़ता के रूप में समझा जा सकता है। मैं यह नहीं कह रहा कि शांति नायर ने अहल्या को किसी आधुनिक मनोवैज्ञानिक निदान के रूप में लिखा है; बल्कि उनकी कविता हमें ऐसा पाठ-संभव अवश्य देती है जिसमें ‘पाषाण’ देह का नहीं, संवेदना के ठिठुर जाने का रूपक बन जाता है।

जिस स्त्री के साथ छल हुआ, वह स्वयं अपराधी नहीं थी, फिर भी अपराधबोध उसी के हिस्से में आ गया। यही अहल्या की त्रासदी का सबसे आधुनिक पक्ष है। अपराध किसी और ने किया, लेकिन उसकी सामाजिक स्मृति पीड़िता के माथे पर लिख दी गई। यह वही व्यवस्था है जिसमें आज भी किसी स्त्री के साथ हिंसा होने पर सबसे पहले उससे ही पूछा जाता है-वह वहाँ क्यों गई थी, उसने भरोसा क्यों किया, उसने पहचान क्यों नहीं लिया, उसने विरोध क्यों नहीं किया। अपराधी के इरादे से अधिक पीड़िता के आचरण की जाँच शुरू हो जाती है। अहल्या इस मनोविज्ञान की हजारों वर्ष पुरानी प्रतिमा बन जाती है।

इसलिए गौतम का शाप केवल एक धार्मिक या पौराणिक प्रसंग नहीं रह जाता। वह उस पुरुष-सत्ता का प्रतीक बन जाता है जो पहले निर्णय सुनाती है और बाद में सत्य खोजती है। गौतम ने इंद्र को नहीं, अहल्या को शाप दिया- यह तथ्य अपने भीतर एक पूरी सभ्यता की संरचना समेटे हुए है। यह कहना गौतम के चरित्र का सरलीकरण नहीं है; बल्कि उस मानसिकता को पहचानना है जिसमें स्त्री की देह पर घटित घटना का नैतिक निर्णय भी स्त्री के विरुद्ध जाता है। शांति नायर की कविताएँ इस व्यवस्था को सीधे-सीधे नारे में नहीं बदलतीं; वे धीरे-धीरे उस पत्थर के भीतर उँगली रखती हैं और पूछती हैं-क्या तुम सचमुच पत्थर थीं?

कविता 23 में यह प्रश्न लगभग मूर्त हो उठता है। कवयित्री पाषाण से पूछती हैं कि क्या वह वास्तव में भारी होकर जड़ हो चुका है, क्या उसमें आसपास की दुनिया का स्पर्श तक नहीं पहुँचता। इस प्रश्न का सौंदर्य इस बात में है कि पाषाण को निष्प्राण वस्तु मानकर संबोधित नहीं किया गया है। उसके भीतर किसी स्मृति, किसी प्रतीक्षा, किसी बचे हुए स्पंदन की संभावना लगातार बनी रहती है। यही वह क्षण है जहाँ शांति नायर की अहल्या करुणा की पात्र से आगे बढ़कर चेतना की पात्र बनती है।

और तब राम का प्रवेश भी एक नए अर्थ में पढ़ा जा सकता है। यदि राम को केवल चमत्कारी उद्धारकर्ता माना जाए, तो अहल्या की कहानी फिर उसी पुरुष-केंद्रित संरचना में लौट जाती है-एक पुरुष ने गिराया, दूसरे ने दंड दिया, तीसरे ने बचाया। लेकिन शांति नायर की कविता को ध्यान से पढ़ने पर राम को एक दूसरी तरह की संभावना के रूप में भी देखा जा सकता है। किसी गहरे मानसिक अंधकार में किसी दूसरे मनुष्य की उपस्थिति कभी-कभी चमत्कार नहीं, विश्वास की वापसी होती है। राम का स्पर्श तब पत्थर को स्त्री में बदलने वाला स्पर्श नहीं है; वह उस स्त्री के भीतर यह विश्वास जगाने वाला स्पर्श है कि वह अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

शायद मुक्ति का अर्थ भी यही है। बाहर से कोई आकर यह घोषित कर दे कि तुम मुक्त हो-यह मुक्ति का एक रूप है। लेकिन किसी के भीतर यह विश्वास वापस लौट आए कि “मैं अभी भी जीवित हूँ”-यह मुक्ति का अधिक गहरा रूप है। इस दृष्टि से राम अहल्या के उद्धारकर्ता होने से अधिक उसके भीतर बुझ चुकी आशा के पुनर्जागरण के प्रतीक हो सकते हैं। और यह अर्थ अहल्या के पाषाण को किसी चमत्कार से नहीं, मनुष्य की मनःस्थिति से जोड़ता है।

यही कारण है कि इस पुस्तक में पाषाण बार-बार अपना अर्थ बदलता है। कहीं वह दंड है, कहीं स्मृति, कहीं मौन, कहीं प्रतीक्षा, कहीं जड़ता और अंततः कहीं भीतर बची हुई आग। दूसरी प्रति की कविता 76 में अहल्या स्वयं लगभग इस निष्कर्ष तक पहुँचती है कि वह केवल पत्थर नहीं है-उसमें मन है, मांस है, मज्जा है और भीतर सुलगती हुई आग है; वह आग बुझी नहीं थी, बल्कि उसी शाप के विरुद्ध बची हुई थी। यह कविता संग्रह के भीतर एक निर्णायक मोड़ की तरह आती है। अब अहल्या शाप की निष्क्रिय प्राप्तकर्ता नहीं रहती; वह अपनी पाषाणता की व्याख्या स्वयं करने लगती है। यही उसकी वास्तविक मुक्ति है।

यहाँ पवन करण का ‘स्त्री शतक’ स्वाभाविक रूप से स्मृति में आता है। पवन करण ने पौराणिक स्त्रियों के उन जीवन-अंशों को आवाज़ देने का प्रयास किया है जिन्हें पुरुष-केन्द्रित आख्यानों ने दबा दिया था। उनकी तारा, सुवर्चा, मदयन्ती, सुकन्या, उर्वशी, क्याधू और अनेक अन्य स्त्रियाँ पुरुषों, ऋषियों, देवताओं और राजाओं से प्रश्न करती हैं। ‘स्त्री शतक’ पर हुई आलोचनाओं में भी यह रेखांकित हुआ है कि संग्रह पुराणों और मिथकीय आख्यानों में दबे स्त्री-स्वरों को नए संदर्भ में सामने लाता है।

पवन करण की सुवर्चा का प्रश्न-पति ने अपनी देह किसी दूसरे प्रयोजन के लिए समर्पित करने से पहले पत्नी की सहमति क्यों नहीं ली-अहल्या के प्रश्न के बहुत पास जाकर खड़ा होता है। मदयन्ती ऋषियों की सत्ता और उनकी कामनाओं पर प्रश्न करती है। उर्वशी प्रेम और भोग के बीच का फर्क पहचानती है। इन स्त्रियों की आवाज़ों में वह बेचैनी है जो पुरुष द्वारा लिखे गए इतिहास की सतह को भीतर से कुरेदती है। लेकिन शांति नायर की अहल्या का अनुभव कुछ और भी सूक्ष्म है। पवन करण की अनेक स्त्रियाँ अपने प्रश्न के साथ सामने आती हैं; शांति नायर की अहल्या पहले अपने मौन से गुजरती है और फिर धीरे-धीरे बोलना सीखती है।

इसलिए दोनों पुस्तकों को साथ पढ़ने पर एक सुंदर साहित्यिक अंतर उभरता है। ‘स्त्री शतक’ मानो इतिहास के अँधेरे कमरों में जाकर कहता है-इन स्त्रियों को भी बोलने दो। ‘अहल्या’ उस कमरे में और भीतर चली जाती है और पूछती है-जिस स्त्री को सदियों से पत्थर कह दिया गया, उसके भीतर जब बोलने की शक्ति ही बची न हो तो उसकी आवाज़ को कौन सुनेगा? पवन करण की परियोजना स्त्री की अनुपस्थित उपस्थिति को उजागर करती है; शांति नायर की परियोजना उस अनुपस्थिति के मनोविज्ञान में उतरती है। पवन करण के यहाँ प्रतिरोध का स्वर अधिक स्पष्ट है, शांति नायर के यहाँ प्रतिरोध कई बार एक धीमी आँच की तरह है।

यहीं गरिमा श्रीवास्तव की ‘देह ही देश’ भी इस पुस्तक के साथ एक अद्भुत, लगभग अस्थिर कर देने वाली समानांतर रेखा खींचती है। क्रोएशिया के युद्ध-क्षेत्रों से गुजरती हुई गरिमा श्रीवास्तव ने युद्ध को इतिहास की घटनाओं, सेनाओं और राजनीतिक निर्णयों से अलग करके स्त्री की देह पर पढ़ा। युद्ध के बाद की स्त्री-यातना और विस्थापन इतिहास के सामान्य आख्यानों में अक्सर अदृश्य रह जाते हैं।

युद्ध समाप्त हो जाने के बाद पुरुष अपने-अपने खेमों में लौट सकते हैं; विजेता अपने पदक लेकर, पराजित अपनी हार लेकर। लेकिन स्त्री उस युद्ध को अपने भीतर लेकर घर लौटती है। उसकी देह स्मृति बन जाती है, उसका मन युद्धभूमि बन जाता है, उसकी संतान उस इतिहास की अगली पीढ़ी बन जाती है। इसी तरह अहल्या के लिए भी घटना उस क्षण समाप्त नहीं हुई जब इंद्र चला गया। असली घटना उसके बाद शुरू हुई-जब उसे अपने ही जीवन की विश्वसनीय गवाह बनने से वंचित कर दिया गया।

इसी अर्थ में अहल्या की देह भी एक देश है—ऐसा देश जिस पर दूसरे पुरुषों ने अपनी सत्ता स्थापित की, जिसके बारे में निर्णय दूसरों ने लिए और जिसकी नागरिकता का अर्थ भी दूसरों ने तय किया। गरिमा श्रीवास्तव की युद्ध-पीड़ित स्त्रियों और शांति नायर की अहल्या को एक साथ पढ़ने पर यह समानता और अधिक तीखी हो जाती है कि इतिहास में पुरुष घटना लिखते हैं और स्त्रियाँ उसके परिणाम जीती हैं।

Simone de Beauvoir का विचार यहाँ किसी बाहरी सिद्धांत की तरह नहीं, बल्कि भीतर से खुलते हुए एक दरवाजे की तरह आता है। ‘The Second Sex’ का प्रसिद्ध वाक्य-“One is not born but becomes a woman”-स्त्री को केवल जैविक अस्तित्व नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से निर्मित पहचान के रूप में देखने का रास्ता खोलता है। अहल्या को इसी दृष्टि से देखें तो उसके जीवन में स्त्री होने की कई परतें दिखाई देती हैं। वह पहले किसी की पत्नी है, फिर पतिव्रता है, फिर संदिग्ध स्त्री है, फिर अपराधिनी है, फिर पाषाण है, फिर उद्धार की पात्र है। हर चरण में उसकी पहचान किसी दूसरे द्वारा निर्धारित होती है। वह स्वयं कब ‘अहल्या’ है?

शायद शांति नायर का पूरा काव्य-संग्रह इसी प्रश्न का उत्तर खोजता है।

अहल्या को देवी बनाने से पहले मनुष्य मानना होगा। उसे पत्थर कहने से पहले उसकी देह के भीतर धड़कते मन को सुनना होगा। उसके उद्धार की कथा सुनाने से पहले उसकी यातना की कथा सुननी होगी। और सबसे बढ़कर, उसके बारे में निर्णय देने से पहले उससे पूछना होगा कि वह स्वयं अपने जीवन को किस नाम से पुकारती है।

इसीलिए इस संग्रह को पढ़ते हुए मुझे लगता है कि अहल्या का सबसे बड़ा दुख उसका पत्थर बनना नहीं था। शायद उससे भी बड़ा दुख यह था कि जब वह पत्थर कही गई, तब किसी ने उसके भीतर की आवाज़ सुनने की कोशिश नहीं की। शांति नायर उस आवाज़ को सुनती हैं। कभी वह बहुत धीमी है, कभी प्रश्न बनकर आती है, कभी स्मृति बनकर, कभी व्यंग्य में, कभी आक्रोश में और कभी इतनी सहज कि वह हमारे अपने समय की किसी स्त्री की आवाज़ लगने लगती है।

दूसरी प्रति में जब अहल्या मिथकीय भूगोल से निकलकर आधुनिक जीवन के दृश्यों में आती है, जब रेलगाड़ी, रास्ते, शहर और रोजमर्रा की वस्तुएँ उसके संसार में प्रवेश करती हैं, तब यह रूपांतरण पूरा हो जाता है। अहल्या अब केवल रामायण की स्त्री नहीं रह जाती। वह आज की स्त्री हो जाती है-वह स्त्री जो अपने लिए रास्ता चुन सकती है, शहर जा सकती है, प्रश्न कर सकती है, अपनी स्मृति को लेकर चल सकती है और शायद सबसे महत्वपूर्ण, अपनी कहानी स्वयं कह सकती है।

यहीं पुस्तक की साहित्यिक शक्ति उसके कथ्य से आगे निकलती है। शांति नायर केवल अहल्या का पुनर्पाठ नहीं करतीं; वे पाठक को भी पुनर्पाठ के लिए बाध्य करती हैं। अब हम जब रामायण की उस पुरानी कथा को याद करेंगे तो शायद केवल राम के चरणों का चमत्कार नहीं देख पाएँगे। हमें उसके पहले की लंबी चुप्पी भी सुनाई देगी। इंद्र का छल दिखाई देगा, गौतम का क्रोध दिखाई देगा, लेकिन उनके बीच एक तीसरी चीज भी दिखाई देगी—एक स्त्री, जो इन दोनों पुरुषों के निर्णयों के बीच अपनी ही आवाज़ खोज रही थी।

और तब शायद अहल्या का उद्धार राम के आने से भी पहले शुरू हो जाता है-उस क्षण जब वह अपने भीतर यह पहचान लेती है कि उसके साथ जो हुआ, वह उसकी संपूर्ण पहचान नहीं है।

किसी स्त्री को उसके ऊपर घटित अपराध से अलग पहचानना ही शायद उसके अस्तित्व को वापस देना है।

इस अर्थ में शांति नायर की ‘अहल्या’ का सबसे गहरा प्रश्न यह नहीं है कि राम ने पत्थर को कैसे जगा दिया। असली प्रश्न यह है कि हमने एक जीवित स्त्री को इतने लंबे समय तक पत्थर क्यों समझा।

और शायद इस पुस्तक का उत्तर भी उतना ही सरल और उतना ही असहज है- क्योंकि वह स्त्री थी।

क्योंकि उसके जीवन के बारे में निर्णय लेने वाले पुरुष थे।

क्योंकि उसके शरीर पर अधिकार जताने वाला पुरुष था।

क्योंकि उसे दंड देने वाला पुरुष था।

क्योंकि उसे उद्धार देने वाला भी पुरुष था।

और इन सबके बीच उसकी अपनी आवाज़ सदियों तक अनुपस्थित रही।

शांति नायर उस अनुपस्थिति में प्रवेश करती हैं। वे अहल्या को पाषाण से मनुष्य नहीं बनातीं। वे उससे भी अधिक कठिन काम करती हैं- वे हमें यह देखने के लिए विवश करती हैं कि वह पहले से ही मनुष्य थी।

यही इस पुस्तक का सबसे सुंदर और सबसे बेचैन कर देने वाला सत्य है।

अहल्या पत्थर नहीं थी। हमारी दृष्टि पत्थर हो गई थी और शायद शांति नायर की कविता उसी दृष्टि में पहली दरार है।

 

रविकान्त राऊत
जबलपुर,मध्यप्रदेश
9425611243

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