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जो ज़हर मरता नहीं, उसकी सीमा कौन तय करेगा?

फॉरएवर केमिकल्स — पीने के पानी के गिलास में घुले अदृश्य PFAS रसायन, पीछे जल शोधन संयंत्र

फॉरएवर केमिकल्स के बारे में सबसे डराने वाली बात उनका ज़हर नहीं, उनका नाम है। ये रसायन सच में “हमेशा के लिए” रहते हैं। ये न धूप में टूटते हैं, न पानी में घुलकर ख़त्म होते हैं, और न शरीर से आसानी से बाहर निकलते हैं। हम मानते आए हैं कि नल से आया, plant में साफ़ किया गया पानी सुरक्षित होता है। पर एक भारतीय अध्ययन बताता है कि कुछ मामलों में शुद्धिकरण के बाद पानी पहले से ज़्यादा प्रदूषित निकला।

यह किसी विदेशी प्रयोगशाला की कहानी नहीं है। यह चेन्नई के पीने के पानी की कहानी है, और शायद हमारे-आपके शहर की भी, जिसकी जाँच अभी तक किसी ने की ही नहीं।

फॉरएवर केमिकल्स: वह ख़बर जो सुर्ख़ी नहीं बनी

इस हफ़्ते देश के प्रमुख अख़बारों में एक विश्लेषण छपा, जिसमें कई भारतीय अध्ययनों को एक साथ रखकर कहा गया कि PFAS  (Per- and Polyfluoroalkyl Substances) यानी फॉरएवर केमिकल्स भारत के जल-स्रोतों में मौजूद हैं, और देश के पास इनसे निपटने का न कोई मानक है, न निगरानी का ढाँचा। राजनीतिक गिरफ़्तारियों, तेल की कीमतों और त्योहारों की भीड़ के बीच यह ख़बर कहीं दब गई। पर इसके भीतर जो सवाल छिपा है, वह किसी चुनावी नारे से बड़ा है।

PFAS हज़ारों कृत्रिम रसायनों का एक परिवार है, जिनमें कार्बन और फ्लोरीन का बंधन होता है। यही बंधन इन्हें लगभग अविनाशी बनाता है। नॉन-स्टिक कड़ाही, waterproof कपड़े, food packaging, आग बुझाने वाला फोम, कई industrial coatings, सब में इनका इस्तेमाल होता रहा है। करीब साठ बरसों से ये हमारी ज़िंदगी में हैं, और अब हमारे पानी, मिट्टी और ख़ून में भी।

इस ख़बर के पीछे का असली सवाल यह है कि जिस ख़तरे को न देखा जा सकता है, न सूँघा जा सकता है, न चखा जा सकता है, क्या हमारी व्यवस्था उसे तब तक नज़रअंदाज़ करती रहेगी जब तक बीमारियों के आँकड़े ख़ुद चिल्लाने न लगें?

भारत में पानी की बहस अब तक मुख्यतः मात्रा की बहस रही है: कितना पानी है, कितना बचा है, किसे मिल रहा है। भूजल के लगातार सूखते जाने के संकट पर हम बात करते रहे हैं। पर गुणवत्ता का प्रश्न, ख़ासकर ऐसे प्रदूषकों का जो पुरानी जाँच-सूचियों में आते ही नहीं, लगभग अछूता है। फॉरएवर केमिकल्स इसी अनदेखे इलाक़े में बैठे हैं।

आँकड़े क्या कहते हैं

2024 में IIT मद्रास के शोधकर्ताओं ने चेन्नई के भूजल, सतही जल और एक water treatment plant के चार चरणों से 14 नमूने लिए। Environmental Sciences Europe में छपे इस अध्ययन में सबसे ज़्यादा PFAS कचरे के ढेरों के पास के घरेलू कुओं में मिले। पर सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि जिन आठ PFAS की जाँच की गई, उन सबकी मात्रा कच्चे पानी की तुलना में साफ़ किए गए पानी में 5 से 103 प्रतिशत तक ज़्यादा थी।

शोधकर्ताओं का अनुमान है कि पानी में मौजूद कुछ अनपहचाने “precursor” रसायन शुद्धिकरण की प्रक्रिया में ही ज़्यादा स्थिर PFAS में बदल गए। यानी हमारी पारंपरिक treatment तकनीक, जो बैक्टीरिया और गंदगी के लिए बनी थी, इस नए दुश्मन के सामने न सिर्फ़ बेबस है, बल्कि अनजाने में उसकी मदद भी कर सकती है।

2025 की एक समीक्षा ने गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के अध्ययनों को देखकर निष्कर्ष निकाला कि PFAS प्रदूषण एक वास्तविक चिंता है। पर देश भर में यह कितना फैला है, यह कोई नहीं जानता, क्योंकि अलग-अलग शोध-दल अलग तरीक़ों से जाँच करते हैं। तमिलनाडु और कोलकाता में माँ के दूध में, वाराणसी के कुओं में और गंगा की मछलियों में भी इनके अंश मिलने की रिपोर्टें आई हैं।

स्वास्थ्य के मोर्चे पर तस्वीर और साफ़ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की कैंसर शोध एजेंसी IARC ने PFOA को “मनुष्यों के लिए कैंसरकारी” और PFOS को “संभवतः कैंसरकारी” श्रेणी में रखा है। अमेरिका की पर्यावरण एजेंसी US EPA ने 2024 में पीने के पानी में PFOA और PFOS की क़ानूनी सीमा 4 नैनोग्राम प्रति लीटर तय की, यानी लगभग शून्य।

और भारत में? पीने के पानी का राष्ट्रीय मानक IS 10500:2012 PFAS के बारे में कुछ नहीं कहता। BIS ने 2025 में इसे संशोधित करने का निर्णय लिया और “उभरते प्रदूषकों” पर एक कार्य-समूह बनाया, पर कितने PFAS शामिल होंगे और सीमा क्या होगी, यह अब तक तय नहीं है। पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार देश में PFAS निर्माण पर कोई विशेष प्रतिबंध नहीं है।

मामला इतना सीधा क्यों नहीं

यहाँ ईमानदारी से दूसरा पक्ष भी रखना ज़रूरी है। किसी पानी में PFAS का मिलना अपने-आप में यह साबित नहीं करता कि वह पानी पीने वाला बीमार होगा। ख़तरा इस पर निर्भर है कि कौन-सा PFAS है, कितनी मात्रा में है, कितने समय से शरीर में जा रहा है। चेन्नई के अध्ययन में भी कुछ यौगिक सुरक्षित सीमा के भीतर थे।

यह तर्क भी दिया जाता है कि भारत जैसे देश में, जहाँ करोड़ों लोग अब भी बैक्टीरिया-जनित दस्त और आर्सेनिक-फ्लोराइड से जूझ रहे हैं, अमेरिकी मानकों की नक़ल करना संसाधनों की बर्बादी है। PFAS हटाने वाली तकनीकें, जैसे activated carbon, reverse osmosis या ion exchange, महँगी हैं। हर नगर निगम पर अचानक यह बोझ डालना व्यावहारिक नहीं। उद्योग जगत भी कहेगा कि इन रसायनों के विकल्प अभी हर जगह उपलब्ध नहीं हैं।

ये तर्क पूरी तरह ग़लत नहीं हैं। पर इनमें एक गहरी चूक है। ये मान लेते हैं कि “पहले बड़ी समस्या, फिर छोटी” का क्रम हमेशा सही है। फॉरएवर केमिकल्स के साथ यह क्रम उल्टा पड़ता है, क्योंकि जो रसायन एक बार पर्यावरण में चला गया, वह दशकों तक वहीं रहेगा। देरी की कीमत हर साल चक्रवृद्धि ब्याज की तरह बढ़ती है।

फॉरएवर केमिकल्स पर देरी की कीमत: अमेरिका से सबक

इतिहास यहाँ सबसे अच्छा शिक्षक है। अमेरिका में DuPont और 3M जैसी कंपनियों को 1970 के दशक से इन रसायनों के ख़तरे का अंदाज़ा था, पर क़ानूनी सीमा तय होने में लगभग पचास बरस लग गए। इस बीच अदालतों में अरबों डॉलर के मुआवज़े चुकाए गए, पर जो पानी दूषित हो चुका था, वह पैसों से साफ़ नहीं हुआ। भारत के पास वह सुविधा है जो अमेरिका के पास नहीं थी: दूसरों की ग़लती से सीखने का मौका।

मेरा स्पष्ट मत है कि भारत को अमेरिकी मानकों की आँख मूँदकर नक़ल नहीं करनी चाहिए, पर इंतज़ार भी नहीं करना चाहिए। तीन काम तुरंत हो सकते हैं, और इनमें से कोई भी बहुत महँगा नहीं है।

पहला, एक राष्ट्रीय baseline अध्ययन, जिसमें एक ही पद्धति से हर बड़े शहर के पीने के पानी की जाँच हो। जो नापा नहीं जाता, उसका इलाज नहीं होता। दूसरा, PFOA और PFOS जैसे सबसे ज़्यादा अध्ययन किए गए यौगिकों के लिए अंतरिम (interim) सीमा, जब तक BIS का पूरा मानक तैयार न हो। तीसरा, PFAS बनाने और इस्तेमाल करने वाले उद्योगों की सूची और उनके अपशिष्ट की अनिवार्य रिपोर्टिंग, ताकि स्रोत पर रोक लगे, सिर्फ़ नल पर नहीं।

यह स्वास्थ्य का ही नहीं, भरोसे का भी प्रश्न है। जब नागरिक को यह पता चले कि उसका नगर निगम जिस पानी को “शुद्ध” कहकर भेज रहा है, उसकी जाँच-सूची में ये रसायन हैं ही नहीं, तो वह बोतलबंद पानी और महँगे घरेलू RO की ओर भागेगा। साफ़ पानी फिर एक सार्वजनिक अधिकार नहीं, निजी ख़रीद बन जाएगा, जिसे सिर्फ़ संपन्न लोग ख़रीद सकेंगे। कैंसर की दवा पर दस गुना मुनाफ़े की तरह, बीमारी की कीमत फिर ग़रीब के ही हिस्से आएगी।

आगे का रास्ता: फॉरएवर केमिकल्स और हमारी याददाश्त

फॉरएवर केमिकल्स हमें एक असहज सच की याद दिलाते हैं: आधुनिक सुविधा की हर चीज़ अपनी कीमत कहीं और, किसी और से वसूलती है। नॉन-स्टिक बर्तन की सुविधा हमने ली, उसका बिल हमारी अगली पीढ़ी के ख़ून में पहुँच रहा है। पराली के धुएँ की तरह यह प्रदूषण दिखाई नहीं देता, इसलिए इस पर न आंदोलन होते हैं, न चुनावी वादे।

हम अक्सर कहते हैं कि प्रकृति सब कुछ पचा लेती है, समय हर घाव भर देता है। पर ये रसायन इसी लोक-विश्वास को झुठलाने के लिए बने थे, और उन्होंने यह काम बख़ूबी किया। जो ज़हर मरता नहीं, उसके सामने हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी हमारी छोटी याददाश्त है।

सवाल यह नहीं कि हमारे पानी में फॉरएवर केमिकल्स हैं या नहीं। सवाल यह है कि हम यह जानना चाहते भी हैं या नहीं। क्योंकि जिस दिन हमने नापना शुरू किया, उस दिन जवाबदेही भी शुरू होगी। और शायद यही वजह है कि अब तक किसी ने नापना ज़रूरी नहीं समझा।

रविकान्त राऊत
जबलपुर, मध्यप्रदेश
9425611243

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2 टिप्पणियाँ

  1. आपका आलेख एक गंभीर विषय को चेतावनी से रेखांकित करता है । जिस देश में जनसंख्या विस्फोट का रूप ले चुकी हो तथा जहां पानी गुणवत्ता नहीं वरन न्यूनतम उपलब्धता की अनिवार्य आवश्यकता हो, जहां जल स्त्रोतों का रखरखाव तो दूर, उनका अंधाधुन दोहन होता आया हो, जहां नदियां सहेजने की प्रवृत्ति के बजाए घरेलू एवं औद्योगिक कचरे के निरापद निष्पादन का माध्यम हो, वहाँ गुणवत्ता गौण ही तो हो जाती है। सरकारी स्तर के समाधान के साथ जन जागरण का भी अहम मसला है। अब कहीं इतने वर्षों बाद हम पानी को समेटने के प्रति सतर्क हुए हैं, उसे सहेजने की जागरूकता अभी प्रतीक्षित ही है। पैकेज्ड वाटर बहुत सुनियोजित माफ़िया का रूप ले चुका है। सरकारी संस्थान नियमों की कमी एवं संसाधनों के लिए जूझ रहे हैं। हम आज भी नदियों में घरेलू पूजन सामग्री डालने को पुण्य मानते हैं तो उद्योग अपनी लागत बचाने के लिए हानिकारक वेस्ट डालने से कब बाज़ आए हैं? आपने समस्या, उसके दुष्परिणाम एवं समाधान का सम्यक ख़ाका प्रस्तुत किया है। एक सच्चा लेखन धर्म निभाया है। हाँ! बड़ी नदियों के शहरी तटों पर कुछ नागरिक जागरूकता देखने में है सफ़ाई के प्रति, जो स्तुतनीय है। पेयजल का शुद्धिकरण भी एक परंपरागत रस्म सा बन चला है जबकि हर स्थान के कच्चे पानी की प्रकृति के हिसाब से उसका समुचित उपचार होना चाहिए।यह एक जीवन एवं उसके भविष्य से जुड़ा विषय है, इस पर शोध की निरंतरता के साथ समाधान के प्रति भी सतर्क रहकर समाधान खोजना होंगे। मूलभूत विषयों पर आपकी लेखनी हेतु साधुवाद। यह संकल्प के साथ ही सिद्धि का भी विषय है।

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