आदमी जो हमेशा सही था
May 6, 2026मेरे एक परिचित आशुतोष को अपनी बुद्धि पर बड़ा घमंड था। और क्यों न होता? आखिर वे हमेशा सही होते थे। हर बहस में। हर बैठक…
पूरा पढ़ें →दर्द, प्रेम, ख़ामोशी और मानव मन की परतों को छूती रचनाएँ — जहाँ रोशनी कम होती है, पर सच ज़्यादा।
मेरे एक परिचित आशुतोष को अपनी बुद्धि पर बड़ा घमंड था। और क्यों न होता? आखिर वे हमेशा सही होते थे। हर बहस में। हर बैठक…
पूरा पढ़ें →वाराणसी की एक संकरी गली में, गंगा की ओर उतरती सीढ़ियों के पास, एक पुरानी किताबों की दुकान थी। वही दुकान जहाँ अनाया पहली बार आई…
पूरा पढ़ें →फ्रैंज क़ॉफ्का का “Gregor Samsa हम सब हैं। फर्क सिर्फ इतना है , उसका खोल बाहर से दिखता था।” हमारा दिखता नहीं, बस इतना ही फर्क़…
पूरा पढ़ें →यहाँ क्षितिज पर धरती और आकाश की दो अलग रेखाएँ नहीं मिलतीं यहाँ क्षितिज बस एक ही साँस में फैला हुआ विस्तार लगता…
पूरा पढ़ें →मैं पहले तुम्हें आसमान दूँगा…और फिर चुपचाप तुम्हारे पैरों के नीचे से जमीन खींच लूँगा।”इसलिये कहता हूँ , खुद को मुझसे बचा कर रखना …
पूरा पढ़ें →शून्य इसे किस रुप में देखा जाये- “निरंकता” के रूप में अथवा “अनंतता” के रूप में ? आज सुबह-सुबह ही , अपने व्हाट्स-एप्प पर शून्य पर दो पोस्ट…
पूरा पढ़ें →आज मैं मजबूत दिख रहा था।कम से कम बाहर से।सुबह की तरह दिन शुरू हुआ।काम की सूची लंबी थी।लोग उम्मीदों के साथ खड़े थे।हर बातचीत में…
पूरा पढ़ें →मेरे पास एक मुखौटा है। इसका कोई नाम नहीं है। या शायद है, पर मुझे याद नहीं। यह मुखौटा तब पहनता हूँ जब मुझे कुछ ख़त्म…
पूरा पढ़ें →मैं अक्सर वहाँ पहुँच जाता हूँ जहाँ जाने की मैंने कोई ठोस योजना नहीं बनाई होती। मेरे भीतर कई कमरे हैं, हर कमरे में एक मुखौटा…
पूरा पढ़ें →माँ ने फोन पर पूछा, “तुम खाना खा लिए? मैंने कहा, “हाँ।” उन्होंने कहा, “अच्छा। सो जाओ फिर।” मैंने कहा, “हाँ।” और यह बातचीत ख़त्म हो गई।…
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