सामान्यता का मुखौटा, जहां दीवारें भूलती नहीं
“सामान्यता का मुखोटा-जहां दीवारें याद रखती हैं” मैं तीन महीने, पाँच दिन और सत्रह घंटे से इसी कमरे में हूँ, […]
“सामान्यता का मुखोटा-जहां दीवारें याद रखती हैं” मैं तीन महीने, पाँच दिन और सत्रह घंटे से इसी कमरे में हूँ, […]
संयुक्त परिवार का आखिरी चूल्हा बसंती देवी के हाथों में अब वह ताकत नहीं रही जो कभी पांच किलो आटे
मिथक के बाद मनुष्य देखिए, चेहरों की भीड़ सजी, सच पर आवरण है, क्यों उसमें कोई दाग नहीं। मनुष्य
एक समय था जब घर सिर्फ एक पता नहीं होता था। वह एक साँस होता था,साझा, उलझी हुई, एक,दूसरे में
मेरे एक परिचित आशुतोष को अपनी बुद्धि पर बड़ा घमंड था। और क्यों न होता? आखिर वे हमेशा सही होते
वाराणसी की एक संकरी गली में, गंगा की ओर उतरती सीढ़ियों के पास, एक पुरानी किताबों की दुकान थी। वही
फ्रैंज क़ॉफ्का का “Gregor Samsa हम सब हैं। फर्क सिर्फ इतना है , उसका खोल बाहर से दिखता था।” हमारा
यहाँ क्षितिज पर धरती और आकाश की दो अलग रेखाएँ नहीं मिलतीं यहाँ क्षितिज बस एक ही साँस में फैला
मैं पहले तुम्हें आसमान दूँगा…और फिर चुपचाप तुम्हारे पैरों के नीचे से जमीन खींच लूँगा।”इसलिये कहता हूँ , खुद को
शून्य इसे किस रुप में देखा जाये- “निरंकता” के रूप में अथवा “अनंतता” के रूप में ? आज सुबह-सुबह ही , अपने