मिथक के बाद मनुष्य
May 15, 2026मिथक के बाद मनुष्य देखिए, चेहरों की भीड़ सजी, सच पर आवरण है, क्यों उसमें कोई दाग नहीं। मनुष्य है मंचों पर, जीवन अभिनय करता…
पूरा पढ़ें →दर्द, प्रेम, ख़ामोशी और मानव मन की परतों को छूती रचनाएँ — जहाँ रोशनी कम होती है, पर सच ज़्यादा।
मिथक के बाद मनुष्य देखिए, चेहरों की भीड़ सजी, सच पर आवरण है, क्यों उसमें कोई दाग नहीं। मनुष्य है मंचों पर, जीवन अभिनय करता…
पूरा पढ़ें →एक समय था जब घर सिर्फ एक पता नहीं होता था। वह एक साँस होता था,साझा, उलझी हुई, एक,दूसरे में गुँथी हुई साँस। दादा की खाँसी,…
पूरा पढ़ें →मेरे एक परिचित आशुतोष को अपनी बुद्धि पर बड़ा घमंड था। और क्यों न होता? आखिर वे हमेशा सही होते थे। हर बहस में। हर बैठक…
पूरा पढ़ें →वाराणसी की एक संकरी गली में, गंगा की ओर उतरती सीढ़ियों के पास, एक पुरानी किताबों की दुकान थी। वही दुकान जहाँ अनाया पहली बार आई…
पूरा पढ़ें →फ्रैंज क़ॉफ्का का “Gregor Samsa हम सब हैं। फर्क सिर्फ इतना है , उसका खोल बाहर से दिखता था।” हमारा दिखता नहीं, बस इतना ही फर्क़…
पूरा पढ़ें →यहाँ क्षितिज पर धरती और आकाश की दो अलग रेखाएँ नहीं मिलतीं यहाँ क्षितिज बस एक ही साँस में फैला हुआ विस्तार लगता है हवा गुजरती…
पूरा पढ़ें →मैं पहले तुम्हें आसमान दूँगा…और फिर चुपचाप तुम्हारे पैरों के नीचे से जमीन खींच लूँगा।”इसलिये कहता हूँ , खुद को मुझसे बचा कर रखना …
पूरा पढ़ें →शून्य इसे किस रुप में देखा जाये- “निरंकता” के रूप में अथवा “अनंतता” के रूप में ? आज सुबह-सुबह ही , अपने व्हाट्स-एप्प पर शून्य पर दो पोस्ट…
पूरा पढ़ें →जिस रात मुझे वह मिला जो मैं चाहता था —उस रात मैं बहुत देर तक छत की सफ़ेद दीवार देखता रहा।कोई उत्सव नहीं था भीतर। कोई…
पूरा पढ़ें →वह समंदर जो कभी नहीं आया शाम ढल रही थी।छत पर रखी चाय ठंडी हो चुकी थी — लेकिन मैंने उसे पिया नहीं। बस पकड़े रहा।…
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