रचनाएँ

नवीनतम आलेख, कहानियां और कवितायें

दर्द, प्रेम, ख़ामोशी और मानव मन की परतों को छूती रचनाएँ — जहाँ रोशनी कम होती है, पर सच ज़्यादा।

‘’देह रुकी, मन बह चला’ मन की अनवरत यात्रा का काव्य-संसारसमीक्षा

मेरी कविता-संग्रह ‘देह रुकी, मन बह चला’ पर नवभारत, रायपुर में नूपेंद्र अभिषेक नृप द्वारा प्रस्तुत पुस्तक समीक्षा मेरे लिए एक सुखद और आत्मीय अनुभव है।…

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बहुध्रुवीयता का दिल्ली संस्करण

बारह और तेरह सितंबर को दिल्ली में कुछ ऐसा हुआ जो पिछले एक दशक की भारतीय कूटनीति में दुर्लभ था। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन…

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जिनके पास कागज़ नहीं, क्या लोकतंत्र में उनकी जगह भी नहीं?

दिल्ली की एक बस्ती में रहने वाला मज़दूर, जो पिछले पंद्रह बरसों से हर चुनाव में वोट डालता आया है, अचानक पाता है कि उसका नाम…

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शी चिनफिंग की दिल्ली वापसी: सात साल की खामोशी के बाद एक सतर्क हाथ

बारह और तेरह सितंबर को दिल्ली में कुछ ऐसा हुआ जो पिछले एक दशक की भारतीय कूटनीति में दुर्लभ था। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन…

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प्यार को पलों में मत तौलिये

उस दिन बुखार से तप रहा था मैं, अकेला, बारिश ऐसी कि खिड़की से बाहर देखना भी मुश्किल। तभी दरवाज़े की घंटी बजी। सामने खड़ा था…

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तेल, टैरिफ और तटस्थता की असली परीक्षा

एक अमीर दोस्त का सबसे बड़ा हथियार क्या होता है? यह धमकी नहीं कि वह रिश्ता तोड़ देगा, बल्कि यह याद दिलाना कि रिश्ता उसकी मर्ज़ी…

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पगार से पहले पीएफ: 25,000 की नई सीमा किसकी जेब भरेगी, किसकी काटेगी?

महीने की पहली तारीख़ को जब सैलरी स्लिप खुलती है, तो ज़्यादातर लोग सीधे एक ही आंकड़े पर नज़र डालते हैं — “इन-हैंड” कितना आया। बाकी…

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वंदे मातरम :एक गीत जिसे अनुमति नहीं, बराबरी चाहिए थी

15 अगस्त की सुबह जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले की प्राचीर पर पहुँचेंगे, तो पहली आवाज़ जन गण मन की नहीं होगी। आज़ादी के अस्सी…

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