जहां दीवारें याद रखती हैं
April 17, 2026मैं तीन महीने, पाँच दिन और सत्रह घंटे से इसी कमरे में हूँ,लेकिन कमरा शायद सैकड़ों साल से यहाँ है।यह छोटा कमरा है — एक खिड़की…
पूरा पढ़ें →दर्द, प्रेम, ख़ामोशी और मानव मन की परतों को छूती रचनाएँ — जहाँ रोशनी कम होती है, पर सच ज़्यादा।
मैं तीन महीने, पाँच दिन और सत्रह घंटे से इसी कमरे में हूँ,लेकिन कमरा शायद सैकड़ों साल से यहाँ है।यह छोटा कमरा है — एक खिड़की…
पूरा पढ़ें →आज मैं मजबूत दिख रहा था।कम से कम बाहर से।सुबह की तरह दिन शुरू हुआ।काम की सूची लंबी थी।लोग उम्मीदों के साथ खड़े थे।हर बातचीत में…
पूरा पढ़ें →मेरे पास एक मुखौटा है। इसका कोई नाम नहीं है। या शायद है, पर मुझे याद नहीं। यह मुखौटा तब पहनता हूँ जब मुझे कुछ ख़त्म…
पूरा पढ़ें →मैं अक्सर वहाँ पहुँच जाता हूँ जहाँ जाने की मैंने कोई ठोस योजना नहीं बनाई होती। मेरे भीतर कई कमरे हैं, हर कमरे में एक मुखौटा…
पूरा पढ़ें →माँ ने फोन पर पूछा, “तुम खाना खा लिए? मैंने कहा, “हाँ।” उन्होंने कहा, “अच्छा। सो जाओ फिर।” मैंने कहा, “हाँ।” और यह बातचीत ख़त्म हो गई।…
पूरा पढ़ें →किसी घटना की चोट हमें इसलिए नहीं लगती कि वह घटित हुई; चोट तो उस अर्थ से लगती है जिसे हम उस घटना पर आरोपित कर…
पूरा पढ़ें →मनोविज्ञान, भाषा और दर्शन का एक खूबसूरत संगम है। आइये इसे एक कहानी के माध्यम से समझने की कोशिश करते हैं। वाराणसी के एक पुराने मोहल्ले…
पूरा पढ़ें →अलमारी के हर ख़ाने पर करीने से पर्चियां चिपका रखी हैं अब यादों को तलाशने में वक़्त ज़ाया नहीं होता आज एक ख़त अचानक निकल आया…
पूरा पढ़ें →कितने सालों के 365 दिन मैं जिसके लिये खिलती रही हर रात जिसके लिये महकती रही करीब रह कर भी निष्ठुर बना रहा वो किसी कांटे…
पूरा पढ़ें →दुनिया अक्सर उन घटनाओं से हिल जाती है जिनकी कल्पना किसी ने नहीं की होती। सब कुछ सामान्य लगता है, और तभी एक अज्ञात विस्फोट, न…
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