चॉक की धूल में एक उम्र
September 17, 2026 · 1 मिनटबरसों पुरानी वह उंगलियां, जो श्याम्पट्ट पर अ, आ लिखती थीं, सफेद धूल में सनी होती थी मास्टर जी की आवाज में कोई…
पूरा पढ़ें →दर्द, प्रेम, ख़ामोशी और मानव मन की परतों को छूती रचनाएँ — जहाँ रोशनी कम होती है, पर सच ज़्यादा।
बरसों पुरानी वह उंगलियां, जो श्याम्पट्ट पर अ, आ लिखती थीं, सफेद धूल में सनी होती थी मास्टर जी की आवाज में कोई…
पूरा पढ़ें →यूट्यूब गलत नहीं है। सोशल मीडिया भी अपने आप में दोषी नहीं है।माध्यम हमारे सामने संभावनाएं रखता है।अंततः यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है कि…
पूरा पढ़ें →तुम्हें जान लेने के बाद भी मैं तुम्हें और पढ़ना चाहता हूँ। तुम्हारी हँसी देखने के बाद अब तुम्हारी खामोशी पढ़ना चाहता हूँ, तुम्हारी आँखों के…
पूरा पढ़ें →जन्माष्टमी के उत्सव के समांतर, अगर हम कृष्ण को देवता के खोल से बाहर निकालकर सिर्फ एक किरदार की तरह देखें, तो सामने एक ऐसा युवा…
पूरा पढ़ें →कल्पना कीजिए कि कोई 22 साल का युवा है। उसे कोडिंग आती है, वह आर्टिफिशियल-इंटेलीज़ेंस समझता है, इंस्टाग्राम पर रील्स बनाता है, व्हाट्सएप पर बात करता…
पूरा पढ़ें →चौदह सितंबर की सुबह दफ्तर के नोटिस बोर्ड पर एक चमकीला पोस्टर चस्पा हुआ — “Hindi Pakhwada: 14 to 28 September, Celebrate Our Mother Tongue!” पोस्टर…
पूरा पढ़ें →एक स्लेट थी, फटी हथेली जितनी छोटी, और मिट्टी सी सोंधी एक कलम, जिसे खड़िया कहते थे बड़े लोग मास्टर जी की उंगली मेरी मुट्ठी पर थी, और मेरी मुट्ठी में था डर , फिर एक लकीर बनी, टेढ़ी, हकलाती हुई, जैसे कोई बच्चा पहला कदम रखता है बिना यह जाने कि गिरना भी सीखने का हिस्सा है ‘अ’ बस एक अक्षर था, पर उस दिन लगा जैसे किसी ने मेरे नाम की पहली ईंट रख दी हो। घर लौटा तो आंगन की धूल में उसी अक्षर को फिर-फिर लिखता रहा, जैसे मैं अपने होने का सबूत गढ़ रहा होऊं बरसों बाद आज भी जब अपने नाम का हस्ताक्षर करता हूं, तो कभी-कभी वही टेढ़ी लकीर याद आ जाती है वह पहला ‘अ’, जो डर से नहीं, एक उम्मीद से लिखा गया था।…
पूरा पढ़ें →आज कैमरा सबके पास है। AI भी सबके पास पहुँच रहा है। लेकिन प्रभावशाली भाषा अभी भी सबके पास नहीं है। यही वह जगह है जहाँ…
पूरा पढ़ें →चौदह सितंबर आते ही देश भर के स्कूलों और सरकारी दफ्तरों में वही तस्वीर दोहराई जाती है – दीवार पर “मातृभाषा का सम्मान करें” के पोस्टर,…
पूरा पढ़ें →शांति नायर के कविता-संग्रह ‘अहल्या’ पर साहित्यिक समीक्षा शांति नायर की ‘अहल्या’ को पढ़ते हुए सबसे पहले जो बात मन में उतरती है, वह यह नहीं…
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