अनाम ख़त
अलमारी के हर ख़ाने पर करीने से पर्चियां चिपका रखी हैं अब यादों को तलाशने में वक़्त ज़ाया नहीं होता […]
कितने सालों के 365 दिन मैं जिसके लिये खिलती रही हर रात जिसके लिये महकती रही करीब रह कर भी
दुनिया अक्सर उन घटनाओं से हिल जाती है जिनकी कल्पना किसी ने नहीं की होती। सब कुछ सामान्य लगता है,
उसने कभी नहीं कहा मैं थकी हूँ। इसलिए नहीं कि थकान नहीं थी, बल्कि इसलिए कि उसे अपनी थकान बताने
हम भारतीय पुरुष की कमर हैं। हमें “हाय” कहना नहीं आता। सुबह सात बजे सिलेंडर ख़त्म हुआ। रमेश उठा, तीन मंज़िल
प्रेम—यह शब्द हमारे बीच कभी नहीं आया। इसे कहना ऐसा होता जैसे किसी बहुत नाजुक काँच पर हथौड़ा मार देना।
उस दिन मैं एक रेलवे स्टेशन पर बैठा था। ट्रेन पैंतीस मिनट लेट थी। बोर्ड पर लिखा था — “प्रतीक्षा
लंच के लिए हमने वही जगह चुनी जहाँ कभी हम अक्सर आया करते थे। पर अब यह जगह भी बदल
आज मैं बिना वजह मुस्कुरा रहा था। कोई बड़ी खुशी नहीं थी। कोई उपलब्धि नहीं। बस एक हल्की, लगभग अदृश्य मुस्कान
घर के बीचों-बीच खड़े होकर अचानक मुझे लगा — मैं कहीं जा नहीं रहा, मैं बस रुकने की जगह बदल